Hindi Poem: वहीँ से खुलता है प्रभु मंदिर का द्वार

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“साँझ गहरा गयी है

चांदनी छिटक कर चहुँ ओर छा गयी है

विलम्ब न कर, चल शरण ले

जागकर, अपने हाथों में प्रभु के चरण ले

पथ है विकट

घना है वन

पग पग बिछे हैं कांटे

न घटेगी पीड़ा तेरी किसी के भी बांटे

मत हो भ्रमित

चल, वो संकरी राह ले

उस उपेक्षित सी अँधेरी गुफा की थाह ले

वहीँ है तेरा सिरजनहार

वहीँ से खुलता है प्रभु मंदिर का द्वार।”

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