हरामखोरी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है

आप सोच रहे होंगे कि कौन है ये जो अपने आप को हरामखोर कह रहा है?

कितने भोले हैं न आप, आप को बचपन से यही सिखाया गया कि  बेटा कमा कर खाओ, पुरुषार्थी बनो, दूसरों का मुंह मत ताको, अपने आप पर भरोसा रखो।

अपने आप पर भरोसा रखोगे तो तुम कुछ भी कर सकते हो, और वही तो आप करते भी हैं – समय पर टैक्स भरते हैं, बिजली चोरी नहीं करते, redlight जम्प नहीं करते, दूसरे शब्दों में आप एक उत्तरदायी नागरिक हैं, पर आपको आज तक मिला क्या, बताइए ज़रा?

अब देखिए ना, मेरा जहाँ मन करता है, जहाँ भी मुझे कोई खाली सरकारी जगह मिलती है – ‘सरकारी’ शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूँ ताकि आप को सदा यही लगता रहे कि अरे ये तो सरकारी जगह है, कोई क़ब्ज़ा करता है तो करता रहे, मुझे क्या।

जिस दिन आपको ये समझ में आ गया कि भूमि का हर वो टुकड़ा जो सरकारी है, वास्तव में आपका है क्योंकि आप जैसे लोगों का ही तो टैक्स का पैसा लगा है उस सरकारी भूमि में, उस दिन से तो मेरी दाल ही गलनी बंद हो जाएगी ना!

हाँ तो क्या कह रहा था मैं?

हाँ, मैं कह रहा था कि मेरा जहाँ मन करता है, मैं वहाँ एक झुग्गी बना लेता हूँ

धीरे-धीरे उस झुग्गी को बड़ा करने लगता हूँ, कुछ दिनों पश्चात उस झुग्गी के आगे एक छोटी सी दुकान बना लेता हूँ, और बस, फिर क्या? फिर तो भूमि का वो टुकड़ा मेरे बाप का हो जाता है।

फिर जब कभी सरकारी कर्मचारी मुझे वहाँ से हटाने के लिए आते हैं तो उन्हे कुछ ‘देकर’ मैं उनका मुँह बंद कर देता हूँ।

और जब कभी उन सरकारी कर्मचारियों पर ‘उपर’ से डंडा आता है मुझे वहाँ से हटाने के लिए, तो आपको क्या लगता है मैं अकेला हूँ?

अरे भाई साब, विपक्षी पार्टियों के नेता आ जाते हैं तुरंत मेरी सहायता के लिए (चुनाव जीतने के लिए उन्हें मेरा वोट भी तो चाहिए ना?) और साथ ही कुछ ‘मानवाधिकार’ का झंडा ऊँचा रखने वाले भी आ जाते हैं।

सब मिलकर गला फाड़ कर चिल्लाने लगते हैं कि देखो-देखो ‘ग़रीब आदमी’ के साथ कैसा अत्याचार किया जा रहा है, ये सरकार तो ग़रीब विरोधी है।

इतना सब होने के बाद तो सरकार को मुझे वहाँ से हटने के लिए ‘मनाना’ पड़ता है – एक बना बनाया घर देकर।

उस मुफ़्त के घर में मैं कुछ दिन आराम से रहता हूँ, फिर उस घर को किसी और को बेचकर किसी और सरकारी जगह पर झुग्गी बना लेता हूँ।

अब आप ही बताओ – जब मुझे बिना कोई टैक्स भरे, बिना किसी home loan की किस्त भरे ही बना-बनाया घर मिल जाता है तो मैं काम क्यूँ करूँ भाई? पागल कुत्ते ने थोड़ी काटा है मुझे!

और एक आप हैं – बेचारा मध्यमवर्गीय प्राणी, दिन भर कोल्हू के बैल की तरह खटता रहता है..अपनी इच्छाओं को मार के खून-पसीना एक करके जैसे-तैसे पैसे कमाता है।

उस पैसे से सरकार को टैक्स भरता है ये सोचकर कि चलो उसका जीवन तो जैसे-तैसे कट गया, जो बचा-खुचा है वो भी कट ही जायेगा..पर कम से कम उसके बच्चों के लिए तो अच्छी सुविधाएं होंगी।

किंतु जब तक मेरे जैसे, ‘हरामखोरी धर्म’ का सच्चे मन से पालन करने वाले लोग भारत में हैं, तब तक मैं आपकी इन कुत्सित मनोकामनाओं की पूर्ति थोड़े ही होने दूंगा।

आप जैसे मूर्ख और आदर्शवादी लोग ही तो मेरा जीवन आधार हैं, यदि आपकी भविष्य की अपेक्षाएं पूरी हो गयीं तो मेरा क्या होगा?

क्या मैं सांप्रदायिक हूँ?

कौन हूँ मैं? हिन्दू, मुसलमान, दलित, पिछड़ा, अगड़ा, वामपंथी, संघी….क्या?

अरे नहीं नहीं सर, मैं तो पूर्ण रूप से सेक्युलर हूँ, साम्प्रदायिकता से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।

न तो मेरा कोई धर्म है और न ही जाति!

मैं हूँ पंथ-निरपेक्ष, धर्म-निरपेक्ष।

और सत्य कहूँ तो मैं अपने आपको उस स्लैब में लेके जाता ही नहीं कि मुझे टैक्स भरना पड़े, मैं तो सदा–सर्वदा टैक्स-अयोग्य ही बना रहना चाहता हूँ क्योंकि उसी में मेरी भलाई है, उसी में तो मेरी हरामखोर प्रवृति की सुरक्षा है।

और काम? वो तो मैं बिलकुल नहीं करना चाहता, और क्यूँ करूँ…काम करने जैसा जघन्य कृत्य करें आपके जैसे आदर्शवादी लोग…

अब देखिये न, अधिक समय नहीं हुआ होगा जब मैंने एक मूर्ख, आदर्शवादी, मोदी फैन को ये चेतावनी दी थी कि जब चुनाव होंगे न २०१९ में, तो मैं वो ग़लती नहीं दोहराऊंगा जो मैंने २०१४ में मोदी जी को वोट देकर की थी और जब उस मोदी फैन ने मुझसे कारण पूछा तो मैंने कहा कि मैंने तो सोचा था मोदी जी अच्छा काम करेंगे, पर हुआ तो एकदम विपरीत ही, उन्होने तो आते ही अपना वास्तविक रंग दिखाना प्रारम्भ कर दिया।

उस मोदी फैन ने फिर पूछा – “कैसे?”

अरे भाई, खान्ग्रेस के कुशासन काल में मैं अपने नैसर्गिक धर्म ‘हरामखोरी’ का निर्भय होकर पालन कर रहा था, किन्तु इस सरकार ने तो आते ही मेरी ‘धर्म की अभिव्यक्ति’ पर ही कुठाराघात कर दिया है।

मुझ जैसे हरामखोर को जो पिछले कई वर्षों से ‘कार्य ‘जैसी घृणित चीज़ से कोसों दूर था, उसे कार्य पर लगा दिया…(हे प्रभु, कितना बड़ा पाप किया था मैंने २०१४ में …क्षमा कर दो)

पहले मैं अपने कार्यालय में आराम से १२ – १२:३० तक पहुंचा करता था और कई बार तो सप्ताहों तक कार्यालय जाता ही नहीं था (कार्यालय शब्द सुनते ही मुझे घिन आती है..उसमे ‘कार्य’ शब्द जुड़ा हुआ है न)

और ये अपवित्र ‘कार्य’ ही तो मुझे मेरे हरामखोरी धर्म का पालन करने से रोकता है…

अब देखिये न, हर माह बिना कुछ किये-धरे ही मुझे मेरा वेतन नियत समय पर मिल जाता था, किन्तु जब से मोदी जी आये हैं, मुझे अपना धर्म-पालन करने की स्वतन्त्रता ही नहीं मिल रही है..अब तो न चाहते हुए भी सवेरे साढ़े नौ बजे ही एन्ट्री करनी पड़ती है और यदि कभी ९:३० से ऊपर हो गए तो समझो गया आधे दिन का वेतन पानी में..(भैंस की आँख!)

मैंने तो २०१४ में श्री नरेन्द्र मोदी जी को ये सोचकर वोट दिया था कि ये हमें अपने धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतन्त्रता देंगे क्योंकि तब तो ये बड़ी सेकुलरिज्म, सेकुलरिज्म की बातें करते थे अपनी रैलियों में, और बस, उनकी इन्ही चिकनी-चुपड़ी बातों में मैं छला गया।

किन्तु आप ये न समझे की मैं निराश हूँ, नहीं, निराश मैं कदापि नहीं हूँ। और आप ये भी न समझे कि मैं केवल इसी युग में हूँ।

मैं हर युग में विद्यमान रहा हूँ

आपको क्या लगता है, बरसों पहले जब मुसलमानों ने भारतवर्ष पर धावा बोला तो वो अकेले ही अपने अभियान में सफल हो गए थे? यदि आप ऐसा मानते हैं तो आप अँधेरे में जी रहे हैं। अरे वो मैं ही तो था जिसने उस समय भी ‘हरामखोरी’ धर्म का पालन करते हुए उन लुटेरों की सहायता की थी (वो कहावत तो याद होगी न आपको – घर का भेदी लंका ढाए?) वो महान ‘घर का भेदी’ मैं ही तो था।

और उनके बाद आये अँग्रेज़, उन लोगों का साथ देना भी तो मेरा परम कर्तव्य था। तो मैंने अपने धर्म का एक बार फिर पालन करते हुए उन का भी साथ दिया।

स्मरण रखिये कि भारत वर्ष को पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेजों का दास बनाने में मेरा सबसे बड़ा योगदान था। आपको तो कृतज्ञ होना चाहिए मेरा, कि अनगिनत बाधाओं के बाद भी मैंने अपने धर्म का पालन करना नहीं छोड़ा।

मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि देश का प्रधानमंत्री कौन है, अन्तर पड़ता है तो केवल इससे कि मैं अपने धर्म का पालन कर पा रहा हूँ या नहीं।

मेरे मार्ग में चाहे जितने व्यवधान उपस्थित किये जाये, मैं केवल एक बात जानता हूँ कि ‘हरामखोरी’ मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा।

जय भारतवर्ष!

Read more:

Was it a Mistake to Elect Narendra Modi as PM?

Green Diwali Conspiracy
I Rarely Host Radio Shows on FM Gold. Here's Why

Avdhesh Tondak is a blogger & voice actor from Western Uttar Pradesh, currently living in New Delhi. He writes personality development articles for young people (students, and young professionals) to help them overcome self-growth challenges. Subscribe to receive his new articles by email.