Hindi Poem: चलते रहो

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“चलते रहो

क्यों हो व्याकुल?

क्या पराजय का भय है?

नहीं?

तो फिर क्यों रुक गए

बताओ तो ज़रा?

संभवतः तुम भयभीत हो

कि कहीं ये दुर्घटना न घट जाये

तुम्हे छोड़ मार्ग में

वो प्रिय मित्र तुम्हारा पीछे न हट जाये

ऐसे विचारों से तुम इस मार्ग पर नहीं बढ़ पाओगे

जीवन के ऊंचे-ऊंचे शिखर भला तुम कैसे चढ़ पाओगे?

मेरी मानो तो ऐसे विचार छोड़ दो

परिचित और अपरिचित दोनों से मुख मोड़ लो

तुम्हारा जीवन नाला बनने जा रहा है

अब भी समय है, उसे सागर की ओर मोड़ दो!”

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