Hindi Poem: जब तक क्षितिज न मिल जाये

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“आओ,

मिलकर प्रकाशमान बनाएं इस धरा को

खिलाएं कुसुम प्रेम के

सागर के पार जायें

हो व्याकुल उत्कंठा से, नव चेतना के गीत गायें

बस बढ़ते ही जायें

जब तक क्षितिज न मिल जाये।”

-by Avdhesh Tondak

Hindi Poem: चलते रहो
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