Hindi Poem on Persistence: चल चला चल

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“माटी की इस देह का लेकर सहारा

संशय, उलझन, भ्रम-सब को कर किनारा

गर्व से अनजान पथ पर तू बढ़ा चल

पगले चल चला चल।।

जीवन बीता जा रहा है

सब कुछ रीता जा रहा है

पुरातन पात झर गए हैं

फूल टहनी से छिटककर गिर गए हैं

नित नवीन काव्य का सृजन कर-चला चल

पगले चल चला चल।।

साँझ गहराने को है

कालिमा छाने को है

झींगुर स्वर करने लगे हैं

पंछी कुछ डरने लगे हैं

पर तू न घबरा रात से – बस बढ़ा चल

चल चला चल

पगले चल चला चल।।”

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